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Tuesday, February 9, 2010

अभिताब देश की आवाज

मीडिया और राजनीती के उसूलो को उजागर करने वाली विजय मलिक की भूमिका मेंअभिताब की रण आ रही है । मीडिया में टी.आर.पी बिज़नस तथा सम्मान के साथ साथदेश के कर्ण धारो का चरित्र उजागर होना है। इस फिल्म में अभिताब मीडिया मेंमहानायक हैं, जो की एक लीड एंकर हैं । जो बोलता है तो देश के लिए, जो सोचता है देशके लिए जिसकी आवाज पर दर्शक ठहर जाता है जिसके विचारों से देश की आत्मा हिलजाती है। जिसकी बाते आखे बंद करके बातो पर विश्वास करते हैं। विजय मलिक कीभूमिका देश की आवाज बनती है। जो अपने ४० वर्ष के रण में राजनीती का खोखलेपनउजागर करता है।


रिमोट को बहार फेख , मेर देश महान जैसे गानों का सार मीडिया के हकीकत के पोलखोलता है। चैनल अपनी टी आर पी के लिए दर्शक को उसकी भावना से पकड़कर बैठतेहैं । बिज़नस के लिए मौलिकता की दिवार पर लटका देते है , एक तो विजय मलिकअपने रन को चलाता है वही दूसरी ओर मीडिया का सही इस्तेमाल नेताओ से सिखाजाना चाहिए । लेकिन आज कल मीडिया के लिए देश की आवाज बनने का कोईमतलब नहीं है । संचालक को जबरदस्ती हजम करने की तरह लगता है इस तरह कीबाते आज कल सिनेमा वाले लोगो के लिए ही रह गयी है । खबरी चैनल अपने मोटो मेंदेश की आवाज, सच जो आप जानना चाहते है ,देश का सबसे बड़ा न्यूज़ चैनल के बेनरोंका बखान करते है , लेकिन उनके एंकरों की आवाज विज्ञापन विभाग से ही बनती है ।मीडिया अपने कर्त्तव्य इस कदर भूल गया है, की सिनेमा वालो को फिल्म बनाने परमजबूर कर दिया, ये ठीक उसी तरह है जैसे देश की कार्य पालिका अपना कर्त्तव्य भूलजाती है और फिर न्यायपालिका अपने सक्रियता दिखाती है । अब देखना ये है की रणकी के मीडिया की तरह हमारा दैनिक मीडिया किस हदतक सूधार करता है या फिर रणका विज्ञापन दिखा कर अपने कार्यालय सुधारता है । रहे राजनेता तो उस परम पिताभगवन के गुणों के विपरीत अवगुणों का भंडार है जिनके बखान में जमीं का सारा पानीको स्याही बनाया जाय और खुद सरस्वती भी लिखे तो कम पड़ जाये ।


आखिर कब सुधरेंगे हम सिनेमा अच्छे गुण सिखाता है । और उसे हम जेब से फिल्मदेखने के बाद टिकेट की तरह निकल के फेक देते है । हम देश के नहीं क्युकी देश हमारा है। इस पेड़ को दीमक जहा से खा सकते है वहा से खा ले । क्युकी पेड़ और देश परोपकारीहोते है. देश की आवाज उठाने के लिए पहले अपने अन्दर की आवाज के साथ अपनेअन्दर आत्मा को जगाना होगा और निकलना होगा। फिर देखते है हम कैसे बनते हैविश्व गुरु सुर और सोने की चिड़िया ।

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